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About देववाणी संस्कृतं - सेवा

👉पुस्तकानि अस्माकं सुमित्राणि भवन्ति✍
👉The books are our best friends✍
👉पुस्तकें हमारी अच्छी मित्र होती हैं ✍

👉मनुष्य जीवन का मुख्य लक्ष्य आनन्द की प्राप्ति है। आनन्द का ज्ञान से गहरा सम्बन्ध है। महर्षि मनु ने मनुस्मृति 5.109 में बताया है- “विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति” अर्थात् “विद्या एवं तप से जीवात्मा पवित्र होती है और बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है। महर्षि कपिल सांख्य-दर्शन 3.23 में लिखते हैं कि ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती। अज्ञानता से बन्धन होता है। महर्षि वेदव्यास ने गीता 4.38 में कहा है- “न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” अर्थात् “ज्ञान के सदृश पवित्र वस्तु संसार में दूसरी नहीं है।” ज्ञान से मनोगत कालुष्य मिटता है तथा बुद्धि निर्मल होती है। निर्मल बुद्धि से ही मनुष्य सदाचरण में प्रवृत्त होता है। ज्ञान दो प्रकार के होते हैं: 👉१— स्वाभाविक (वह ज्ञान जो सदा एकसमान रहता, कभी घटता-बढता नहीं है )।
👉२—नैमित्तिक (जो किसी निमित्त से प्राप्त होता है) बिना नैमित्तिक ज्ञान के मनुष्य की उन्नति नहीं होती, नैमित्तिक ज्ञान की प्राप्ति वेदों एवं ऋषिकृत ग्रन्थों के स्वाध्याय से ही होती है। अवैदिक ग्रन्थों से मिथ्या ज्ञान होता है, जो की मनुष्य के बन्धन का कारण बनता है. ऋषि-प्रणीत ग्रन्थों को इसीलिए पढ़ना चाहिए, क्योंकि वे पक्षपातरहित, धर्मात्मा, विद्वानों के द्वारा प्रकाशित होते हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं- “महर्षि लोगों का आशय, जहाँ तक हो सके वहाँ तक सुगम और जिसके ग्रहण करने में थोड़ा समय लगे, इस प्रकार का होता है। पक्षपात-पूर्ण लेखकों द्वारा रचित ग्रन्थ अनार्ष-ग्रन्थ कहलाता है, जिसका स्वाध्याय ऐसा है कि जैसे पहाड़ का खोदना और कौड़ियो का लाभ होना। जबकि आर्ष-ग्रन्थों का पढ़ना ऐसा है कि जैसे एक गोता लगाना और बहुमूल्य रत्नों का पाना।” अतः आर्ष-ग्रन्थों के स्वाध्याय की विशेष महत्ता है।
👉देववाणी संस्कृतम्✍ का मुख्य उद्देश्य महापुरुषों तथा संसार के सभी श्रेष्ठ लोगों द्वारा लिखित तथा उच्चरित सामग्री को सम्पूर्ण संसार में अधिक से अधिक लोगों में विभिन्न प्रकार से प्रचार-प्रसार करना है। इसके अन्तर्गत सभी उत्तम पुस्तकों को न्यूनतम सम्भावित मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराना, अधिक से अधिक आर्ष पुस्तकों का digitization, संस्कृत-भाषा को लोगों को उनके अपने गृह पर ही 👉” देववाणी संस्कृतम्” ✍ यूट्यूब चैनल तथा👉
“devavanisanskritam.com” ✍बैठे—बैठे पढ़ाना, दुर्लभ ग्रन्थों को प्रकाशित कराना, विद्वानों के लेखों से शंकाओं का निवारण आदि कार्य हैं। इस ईश्वरीय कार्य में आप सभी विद्वानों का तन-मन-धन से सहयोग अपेक्षित है। हमारी योजना निकट भविष्य में वेदों के निःशुल्क वितरण की है, इस हेतु प्रारम्भ में वेदों को न्यूनतम मूल्य पर पाठकों को उपलब्ध कराया जाएगा। वेदों के साथ वेदार्थ में सहायक ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका और सत्यार्थप्रकाश के वितरण की भी योजना है। इस वेबसाइट devavanisanskritam.in पर वेदादि आर्ष-ग्रन्थों पर आधारित सामग्रियों को शब्द (Text), चित्र (Picture), श्रव्य (Audio), चलचित्र (Video), प्रदर्शन (Presentation), लेखाचित्र (Infographics) आदि के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।

by Shri Acharya Shravan Kumar– CEO